Saturday, January 31, 2026

तुम्हे दिल ने पुकारा

मेरी प्यारी सोंचू,
तुमसे कितनी बाते करने का मन करता है पर अभी तुम बहुत छोटी हो और बहुत सी बातें न समझ सकती हो न ही करने की उम्र है . जब शायद तुम बड़ी हो जोगी तब वह सब बातें ख़तम ही हो जाएँगी या फिर मायने भी नहीं रखेगी. तब तक शायद तुम बुआ को भूल भी जाओगी . वह सब बचपन की बातें और प्यार को भूल जाओगी जिसमे बुआ की पूरी दुनिया ही तुम थी . शायद तब बुआ भी हालत से समझौता कर के अपने को बिजी रखने में और अपना समय सेवा में लगा के तुमसे सालो साल बहुत दूर हो चुकी होगी .. पर फिर भी तुम उसके दिल में वैसे ही रहोगी जिसको वह दुनिया में सब से ज्यादा प्यार करती है ..मम्मी पापा और खुद से ज्यादा.
२०२० में मैंने एक इच्छा की थी की बचपन में जो समय हमें अपने दादा-दादी बुआ चाचा के साथ मेमोरीज बनाने के लिए मिला वैसा ही समय तुम्हे भी मिले एक भरे पूरे परिवार का. जिसमे घर का खाना खेल चहलकदमी और ढेर सारा प्यार भरा हो और जो हम सब के लिए आगे जीने का सहारा और याद बने. येसमय कुछ सालों का हो ..काम से कम तीन साल जिसको हम पूरे परिवार साथ जीए. और देखो न भगवन के कोविद का वह २०२०-२०२२ तक का समय वर्क फ्रॉम होम और साथ का दे ही दिया जिसमे सब साथ थे और तुम हमारे साथ थी.
पापा की तबियत बिलकुल ख़राब थी जब में बैंगलोर से आयी ..लगता था की अब प्राण ही नहीं बचे हैं .पर कोविद में उनकी सेवा कर उन्हें भी चलने फिरने और एन्जॉय करने लायक बना दिया.
गुंटूर और बैंगलोर में रहने के बाद मुझे लगा की तुम मुझे पहचानोगी नहीं और तुम्हारा लगाव भी नहीं रहेगा पर तुमने मुझे अपने प्यार में ऐसा बंधा की मेरी सुबह से लेकर शाम रात भी तुम बन गयी . हो भी क्यों ना तुम हमारे घर की पहली नातिन थी ..पहले नेक्स्ट जनरेशन की संतान जो की कई सलून बाद हुयी थी . में अकेली थी तोह मेरे कोई अपना बच्चा नहीं था ..तोह तुम्ही में मैंने अपना मातृत्व पूरा किया और अपनी साड़ी ममता तुम पर लुटाई . तुमने भी मेरे प्यार को पूरा तरह स्वीकारा और दुगुना प्यार दिया . तुम्हारी आँख खोलने से लेकर सोने तक का खेल तुम मेरे कमरे में मेरे साथ खेलती . तुम्हरो वोह सपनो का इंटरप्रिटेशन सुबह सुबह मेरी आँख खुलने से पहले ही शुरू हो जाता जो की तुम जबराम अपने हाथों से मेरी आँख खोलकर मुझे बताती . में कितनी भी नींद में हूँ या थकी हूँ फिर भी तुम्हारी जिज्ञासु आवाज़ को सुनना मुझे किसी दिव्या वाणी से कम नहीं लगता . में वोह पल खोना नहीं चाहती थी और समेट के यादों के ख़ज़ाने में संजो के रखना चाहती थी ताकि फिर उन्ही पलों में जा कर उनका आनंद ले सकू . देखो ना अभी तोह सिर्फ वोह यादें ही रह गयी हैं ..और तुम अपनी नयी ज़िन्दगी में व्यस्त हो गयी हो . बुआ को तोह शायद याद भी नहीं करती .. या फिर शायद तुम्हे बुआ को याद करने और उसके साथ आनंद के पल मानना और बिताना मना किया गया है
शायद तुम भी मुझे याद करती हो ..वोह पल तुम्हे अभी भी याद हैं .. जब तुम अकेले घर आयी हो तोह तुम्हारी आवाज़ में चहक और उन्मुक्त ख़ुशी होती हैं .. और जब तुम अपनी माँ के साथ आती हो तोह दरी सेहमी आती हो.. क्युकी उसको तुम्हारा बुआ के साथ खुश रहना पसंद नहीं.. क्युकी उसे तुम्हारी बुआ ही पसंद नहीं .
मुझे अभी भी याद है की जब तुम लोग अपना घर छोड़ कर २०२२ में दूसरे घर में रहने गए थे तब तुम बुआ से मिलने आती तोह बहुत ही एन्जॉय करती खेलती कूदती खाती पीती और बुआ साथ ढेरो बातें करती. तुम्हारी आँखों में ख़ुशी की चमक और बातों में खनक होती और इसी ख़ुशी को तुम अपनी माँ के साथ भी शेयर करती. उसकी अपनी ननद से नफरत और ईर्ष्या यह बर्दाश्त नहीं कर सकीय की तुम उसके सिवा किसी और से इतना प्यार करो और खुश हो. वोह चाहती थी की दुनिया में सिर्फ और सिर्फ तुम उसी से प्यार करो और किसी से नहीं. उस ने कभी और कीड़ी रिलेशन से प्यार पाया ही नहीं था. उसने उस दिन तुम्हे इतना मारा की तुम्हारे नाज़ुक गालों पर उसके छांटो के निशान तक बन गए. एक पांच साल की बच्ची तड़प तड़प कर रो गयी जिसको बाबा से दरवाज़े के उस तरफ से महसूस किया . उनका दिल चिर चिर हो गया और उन्होंने तुम्हे मेरे यहाँ जाने से मम्मी को मना करने को बोलै .जब मुझे इस बात का पता चला तोह मेरा दिल बहित दुखा और में तुमसे दूरी बनाने का फैसला किया .. एक दो बार तुम फिर आयी घर और तुम्हारी माँ ने फिर से ऐसा सलूक किया . उसके बाद तुम भी डर गयी मेरे से मिलने पर . जब तुम आती और में ही घर पर होती तोह तुम रोने लगती की घर जाना है क्यूंकि तुम्हे अपनी माँ की भयानक मार याद आ जाती . मैंने भी तुमसे दूरी बना ली और फिर नहीं बुलाया .

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