कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं
मैं यादों का किस्सा खोलूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
मैं गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
अब जाने कौन-सी नगरी में, आबाद हैं जाकर मुद्दत से… …
मैं देर रात तक जागूँ तो , कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
कुछ बातें थीं फूलों जैसी, …कुछ लहजे खुशबू जैसे थे, ..
.मैं शहर-ए-चमन में टहलूँ तो, …कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
सबकी जिंदगी बदल गई, …एक नए सिरे में ढल गई, …
किसी को नौकरी से फुरसत नहीं… …किसी को दोस्तों की जरूरत नही… …
सारे यार गुम हो गए हैं… ….”तू” से “तुम” और “आप” हो गए हैं… …
मैं गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
धीरे धीरे उम्र कट जाती है… …जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है, …
कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है… और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है … …
किनारों पे सागर के खजाने नहीं आते, …फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते… …
जी लो इन पलों को हंस के दोस्त, फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ….
**हरिवंशराय बच्चन**
हरिवंशराय बच्चन जी की यह कविता अक्सर हमारे चालीस पचास के दशक के आस पास के लोगो को अतीत में ले जाती है जहा खिलखिलाता बचपन था, ज़िम्मेदारियाँ काम या नहीं थी ..माँ बाप के आशीर्वाद का हाथ था, ख़ुशी थी और ढेर सारे दोस्त थे .. हाँ दोस्त या सहेलियां थी. दोस्ती की परिभाषा शायद तब और थी., अपनापन था, सहयोग था और प्यार था . दोस्तों से घंटो देर तक बातें करना, भविस्य के सपने और योजना साझा करना, छोटी छोटी चीज़ज़ों में खुशिया तराशना और उनको सेलिब्रेट करना.. वह समय ही अलग था ..इसलिए वह समय जवान था
अब के समय में सभी लोग प्रैक्टिकल और मटेरिअलिस्ट हो गए हैं जिनके पास न समय है न रूचि किसी से मिलने की . शायद ज़िन्दगी की भाग दौड़ और रोटी पानी की चिंता , परिवार की ज़िम्मेदारी और दिखावे की होड़ ने उनके ऐसा बना दिया है जिसमे किसी के लिए कोई भावना, प्यार और जगह नहीं है
मैं गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
अब जाने कौन-सी नगरी में, आबाद हैं जाकर मुद्दत से… …
मैं देर रात तक जागूँ तो , कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
कुछ बातें थीं फूलों जैसी, …कुछ लहजे खुशबू जैसे थे, ..
.मैं शहर-ए-चमन में टहलूँ तो, …कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
सबकी जिंदगी बदल गई, …एक नए सिरे में ढल गई, …
किसी को नौकरी से फुरसत नहीं… …किसी को दोस्तों की जरूरत नही… …
सारे यार गुम हो गए हैं… ….”तू” से “तुम” और “आप” हो गए हैं… …
मैं गुजरे पल को सोचूँ तो, कुछ दोस्त बहुत याद आते हैं… …
धीरे धीरे उम्र कट जाती है… …जीवन यादों की पुस्तक बन जाती है, …
कभी किसी की याद बहुत तड़पाती है… और कभी यादों के सहारे ज़िन्दगी कट जाती है … …
किनारों पे सागर के खजाने नहीं आते, …फिर जीवन में दोस्त पुराने नहीं आते… …
जी लो इन पलों को हंस के दोस्त, फिर लौट के दोस्ती के जमाने नहीं आते ….
**हरिवंशराय बच्चन**
हरिवंशराय बच्चन जी की यह कविता अक्सर हमारे चालीस पचास के दशक के आस पास के लोगो को अतीत में ले जाती है जहा खिलखिलाता बचपन था, ज़िम्मेदारियाँ काम या नहीं थी ..माँ बाप के आशीर्वाद का हाथ था, ख़ुशी थी और ढेर सारे दोस्त थे .. हाँ दोस्त या सहेलियां थी. दोस्ती की परिभाषा शायद तब और थी., अपनापन था, सहयोग था और प्यार था . दोस्तों से घंटो देर तक बातें करना, भविस्य के सपने और योजना साझा करना, छोटी छोटी चीज़ज़ों में खुशिया तराशना और उनको सेलिब्रेट करना.. वह समय ही अलग था ..इसलिए वह समय जवान था
अब के समय में सभी लोग प्रैक्टिकल और मटेरिअलिस्ट हो गए हैं जिनके पास न समय है न रूचि किसी से मिलने की . शायद ज़िन्दगी की भाग दौड़ और रोटी पानी की चिंता , परिवार की ज़िम्मेदारी और दिखावे की होड़ ने उनके ऐसा बना दिया है जिसमे किसी के लिए कोई भावना, प्यार और जगह नहीं है


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